आज आँखे बंद थी तो मन न जाने क्या क्या सोच रहा था...एक चलचित्र सा चल रहा था जैसे...शब्दबद्ध करने की कोशिश कर रहा हूँ......
अनुभव: कैसी हो कल्पना?
कल्पना: ठीक हूँ। और आप कैसे हैं?
अनुभव: कल्पना, मैं तुमसे कुछ बात करना चाहता हूँ।
कल्पना: हाँ.. हाँ॥ कहिये क्या बात है?
अनुभव: कल्पना पता नहीं इन दिनों मुझे क्या हो गया है..मन हर पल तुम्हे ही अपने सानिध्य में देखना चाहता
है..पिछले कुछ समय से मैं आँख बंद करता हूँ तो बंद आँखों से केवल तुम ही नज़र आती हो। ये बेचैनी
जैसे कुछ कहना चाहती हो....
कल्पना: क्या?
अनुभव: यही कि मुझे तुमसे अनजाने में मोहब्बत हो गयी है।
कल्पना: (खामोशी॥निगाहों में जैसे कोई भाव नहीं हो)
अनुभव: क्या हुआ?तुम खामोश क्यों हो?क्या मेरी बात पर विश्वास नहीं? देखो कल्पना मैं सच कहता हूँ मैं तुम्हे
चाहने लगा हूँ..और तुम जानती हो मुझे खुद भी पता नहीं? तुम्हारा बिना बताये आना मेरा मन
प्रसन्न कर देता हैं वहीँ तुम्हारा जाना बहुत तकलीफ देता है॥
कल्पना: मगर आप शादीशुदा हैं?
अनुभव: तुम ही ये सोचो कल्पना कि तुम यह अची तरह से जानती हो कि मैं अपनी शादीशुदा जिन्दगी से खुश
हूँ..कोई कमी नहीं हैं फिर भी ये मन कैसे तुम्हारे बारे में ऐसा सोच सकता हैं....पर यकीं मानो मैंने कुछ
नहीं किया...इसीलिए तो कहते हैं कि प्यार किया नहीं जाता बल्कि हो जाता है....
कल्पना: मगर आप मेरे चक्कर में मत पड़िये...
अनुभव: लेकिन क्यों..क्या उम्र के अंतर कि वजह से?
कल्पना: नहीं वो बात नहीं..लेकिन मैं उस लडकी के बारे में सोचती हूँ जो आपकी पत्नी है...मैं इसे ठीक नहीं
मानती..
अनुभव: इसलिए कि प्यार में तुम उसका हक छीन लोगी?
कल्पना: नहीं..ये गलत है॥
अनुभव: ये गलत तो तब होगा जब मैं उसके प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन ना करूं॥
कल्पना: (विचारमग्न)
अनुभव: क्या प्यार में मैं इतना आगे चला जाऊँगा कि तुमसे .................
कल्पना: नहीं बात वो नहीं है?
अनुभव: फिर क्या बात है?
कल्पना: (खामोशी..निगाहों में जैसे कोई भाव नहीं हो)
अनुभव: तुम शायद ये सोच रही हो कि इस प्यार की मंजिल क्या हो सकती है..मैं शादीशुदा हूँ इस लिए तुमसे
शादी तो कर नहीं सकता और बिना शादी के प्यार का क्या अर्थ है?
कल्पना: (खामोशी)
अनुभव: क्या बात हैं कल्पना..क्या तुम एक ऐसे प्रेम की पवित्र भावनाओं के बारे में नहीं सोच सकती जो
शारीरिक संबंधों से परे हो? क्या शादी से होने वाली निकटता के बिना प्रेम का कोई मोल नहीं? मैं तो बस
तुम्हारे आँचल में अपने ह्रदय के भावों का एक आश्रय चाहता हूँ॥
कल्पना: लेकिन वो आश्रय तो तुम्हे अपनी पत्नी में ढूढना चाहिए?
अनुभव: सही कह रही हो लेकिन तुम में क्यों नहीं?
कल्पना: इसलिए कि प्रेम गाढ़ होने पर शारीरिक निकटता आ ही जाती हैं
अनुभव: हाँ दुनिया में प्रेम के बारे में लोगों का यही मत हैं
कल्पना: नहीं..प्रेम का स्वभाव ही ऐसा हैं
अनुभव: ऐसा नहीं हैं..क्या हीर राँझा, सोहनी महिवाल आदि प्रेम करने वालों ने शादी की थी? शादी न करने से
उनका प्रेम कलंकित हो गया?
कल्पना: नहीं..लेकिन???
अनुभव: मैं समझ गया...इस मतलबी दुनिया ने हर काम का, हर भाव का कोई न कोई फायदा बना दिया है इसी
लिए तुम्हे इस प्रेम के बारे में विश्वास नहीं होता..इसी लिए तुम सोचती हो कि ऐसे प्रेम का क्या फायदा
जो शादी तक ना पहुंचे..मगर कल्पना मैं तुम्हारे इस निर्णय के बाद भी तुम्हे चाहना नहीं छोड़
सकता..दिल की इन गहराईयों में तुम मेरे बिना यत्न के बस गई हो कि पीछे मुड़ना संभव ही नहीं...........
और आँखों में आंसू और वीरान दिल लिए थके क़दमों से अनुभव चला जाता हैं...............
Tuesday, March 16, 2010
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सच्चा प्रेम वाही है जिसकी तृप्ति आत्म-बलि पर हो निर्भर,
ReplyDeleteत्याग बिना निष्प्राण प्रेम है करो प्रेम पर प्राण निछावर
शायद सही मायने में प्रेम के परिणति, त्याग ही है.... जिस व्यक्ति के लिए हम हर सुख दुःख त्याग देने को तत्पर रहते हैं...वह व्यक्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी रूप में हमारे प्रेम का भागीदार है. सच्चे शब्दों में प्रेम की किसी सम्बन्ध, रिश्ते, जात, वय या सीमाओं में परिभाषित कर पाना संभव नहीं है........
इस वार्तालाप में भी प्रेम की जटिलताओं को दर्शाने एक प्रयास है.
आशीष सर आपका यह प्रयास भी सरहनीय लगा मुझे.
~~ अनुराग